सीआईए वर्ल्ड फ़ैक्टबुक स्टैटिटिक्स के अनुसार ईरान की आठ करोड़ की
आबादी में 60 फ़ीसदी लोग 30 साल से कम उम्र के हैं. ईरान में तकनीकी रूप से
फ़ेसबुक और ट्विटर प्रतिबंधित है लेकिन ज़्यादातर युवा प्रतिबंध की
उपेक्षा कर वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं.
वॉशिंगटन बेस्ड फ़्रीडम हाउस 2018 की स्टडी के अनुसार ईरान में 60 फ़ीसदी लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में इस आंदोलन को सोशल मीडिया के ज़रिए काफ़ी फैलाया गया.
1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में महिलाओं पर कई तरह की पाबंदी लगा दी गई थी. लेकिन इस बार सरकार को झुकना पड़ा. आयतोल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी के शासन में महिलाओं को बाल ढंकने पर मजबूर किया गया और उनसे तलाक़ फाइल करने का हक़ भी वापस ले लिया गया था. टाइट कपड़े पहने को लेकर भी महिलाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया.
शराब और संगीत पर भी पाबंदी लगा दी गई. अब यहां की महिलाएं कह रही हैं कि उन्हें चुनने की आज़ादी दी जाए कि वो इस्लामिक कोड के हिसाब से कपड़े पहनना चाहती हैं या नहीं.
'हम प्रकृति की पूजा करते हैं और
शुक्रवार को अदालत का फ़ैसला आते ही प्रदर्शन और तेज़ हो गए. विरोध कर रहे पर्यावरण कार्यकर्ताओं की पुलिस के साथ हाथापाई हुई और इलाक़े में तनाव को देखते हुए तैनात पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ा दी गई और साथ ही पूरे इलाके में धारा 144 लगा दी गई.
पुलिस ने विरोध कर रहे 50 से अधिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया और अन्य कई लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है.
इस बीच आरे कॉलोनी के अंदर बसे गांवों में रहने वाले आदिवासियों को अपने भविष्य की चिंता सता रही है.
प्रकृति ही हमारा ईश्वर है.'....'आदिवासी पूरी तरह से जंगल पर निर्भर हैं.'
कई युवा आदिवासी व्यस्त मुंबई शहर में न रहकर इन शांतिपूर्ण गांवों में ही रहना पसंद करते हैं.
अब मुंबई मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए इसी आरे कॉलोनी के जंगल काटे जा रहे हैं. इसी इलाके में मेट्रो के लिए कार शेड बनाया जाएगा और इसके लिए तकरीबन 2,185 पेड़ काटे जाएंगे.
पेड़ों की कटाई शुरू भी हो चुकी है लेकिन यहां के पेड़ काटे जाने का भारी विरोध भी हो रहा है.
स्थानीय लोगों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं, कुछ बॉलीवुड कलाकारों और राजनीतिक पार्टियों ने पेड़ काटे जाने का प्रस्ताव आते ही विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था.
इस मद्देनज़र बॉम्बे हाईकोर्ट में कई याचिकाएं भी दायर की गईं लेकिन अदालत ने इस इलाके को जंगल मानने से इनकार करते हुए सभी याचिकाएं ख़ारिज़ कर दीं.
यहां रहने वाले आदिवासी युवा श्याम प्रकाश भोइर कहते हैं, "जैसे एक बेटा अपनी मां के बग़ैर नहीं रह सकता, वैसे ही हम इस जंगल के बिना नहीं रह सकते. "एक पेड़ सिर्फ़ पेड़ नहीं होता. उसमें छिपकली, बिच्छू, कीड़े, झींगुर और चिड़िया भी रहती हैं. हर पेड़ की अपनी इकॉलजी है. यह सिर्फ़ पेड़ की नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व की बात है."
आरे के ही एक गांव में रहने वाली मनीषा ने बताया, "हमसे पिछली पीढ़ी पढ़ी-लिखी नहीं थी. वह कृषि पर निर्भर थी और आदिवासी लोग जंगलों से ही सब्ज़ियां इकट्ठा करते थे. हम भी उसी पर निर्भर थे. हम बाज़ार से कुछ भी नहीं ख़रीदते थे."
मुंबई मेट्रो रेल प्राधिकरण ने कहा है कि किसी भी आदिवासी या वन्यजीव की जगह को कार डिपो के लिए नहीं लिया जाएगा लेकिन आदिवासियों का मानना है कि मेट्रो परियोजना के यहां आने के बाद वन्यजीवन पर इसका असर पड़ेगा.
रेल प्राधिकरण के अनुसार, "यह एक महत्वपूर्ण परियोजना है. इलाके में यात्रा करने के दौरान हर दिन 10 लोग मर जाते हैं. मेट्रो शुरू होने के बाद मुंबई के स्थानीय लोगों का तनाव कम हो जाएगा."
मनीषा कहती हैं, "हम मेट्रो या मेट्रो कार शेड का विरोध नहीं कर रहे हैं. हम मेट्रो कार डिपो को बनाने के लिए 2,185 से अधिक पेड़ काटे जाने का विरोध कर रहे हैं. हम नहीं चाहते कि विकास न हो लेकिन ये पेड़ की क़ीमत पर नहीं होना चाहिए."
मनीषा के मुताबिक़, "यहां पेड़-पौधे और क़ुदरत का ऐसा रूप इसलिए है क्योंकि आदिवासी इसका संरक्षण करते हैं. सरकार कहती है कि ज़मीन सरकार की है, लेकिन सरकार यहां के पेड़ों की देखभाल नहीं करती."
आरे कॉलोनी में 4.8 लाख पेड़ हैं लेकिन फिर भी यह वन विभाग के अंतर्गत नहीं हैं.
इस पर श्याम कहते हैं. "उन्होंने कहा है कि वे 2,185 पेड़ काटेंगे. इस छोटी सी जगह में बहुत सारे पेड़ हैं, इसका मतलब है कि यह जंगल है. कोई भी इस पर सहमत होगा लेकिन सरकार इसको नहीं मानती है."
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि अदालत की अनुमति के बाद पेड़ को काटने के लिए 15 दिनों का समय दिया जाना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हुआ और तुरंत ही पेड़ काटे जाने लगे.
वॉशिंगटन बेस्ड फ़्रीडम हाउस 2018 की स्टडी के अनुसार ईरान में 60 फ़ीसदी लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में इस आंदोलन को सोशल मीडिया के ज़रिए काफ़ी फैलाया गया.
1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में महिलाओं पर कई तरह की पाबंदी लगा दी गई थी. लेकिन इस बार सरकार को झुकना पड़ा. आयतोल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी के शासन में महिलाओं को बाल ढंकने पर मजबूर किया गया और उनसे तलाक़ फाइल करने का हक़ भी वापस ले लिया गया था. टाइट कपड़े पहने को लेकर भी महिलाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया.
शराब और संगीत पर भी पाबंदी लगा दी गई. अब यहां की महिलाएं कह रही हैं कि उन्हें चुनने की आज़ादी दी जाए कि वो इस्लामिक कोड के हिसाब से कपड़े पहनना चाहती हैं या नहीं.
'हम प्रकृति की पूजा करते हैं और
शुक्रवार को अदालत का फ़ैसला आते ही प्रदर्शन और तेज़ हो गए. विरोध कर रहे पर्यावरण कार्यकर्ताओं की पुलिस के साथ हाथापाई हुई और इलाक़े में तनाव को देखते हुए तैनात पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ा दी गई और साथ ही पूरे इलाके में धारा 144 लगा दी गई.
पुलिस ने विरोध कर रहे 50 से अधिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया और अन्य कई लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है.
इस बीच आरे कॉलोनी के अंदर बसे गांवों में रहने वाले आदिवासियों को अपने भविष्य की चिंता सता रही है.
प्रकृति ही हमारा ईश्वर है.'....'आदिवासी पूरी तरह से जंगल पर निर्भर हैं.'
ये कहना है कि मुंबई की आरे कॉलोनी में रहने वाले श्याम प्रकाश भोइर और मनीषा धिंडे का.
इस आरे कॉलोनी के भीतर 27 छोटे-छोटे गांव हैं और इन गांवों में सदियों से तकरीबन 8,000 आदिवासी रहते आए हैं. कई युवा आदिवासी व्यस्त मुंबई शहर में न रहकर इन शांतिपूर्ण गांवों में ही रहना पसंद करते हैं.
अब मुंबई मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए इसी आरे कॉलोनी के जंगल काटे जा रहे हैं. इसी इलाके में मेट्रो के लिए कार शेड बनाया जाएगा और इसके लिए तकरीबन 2,185 पेड़ काटे जाएंगे.
पेड़ों की कटाई शुरू भी हो चुकी है लेकिन यहां के पेड़ काटे जाने का भारी विरोध भी हो रहा है.
स्थानीय लोगों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं, कुछ बॉलीवुड कलाकारों और राजनीतिक पार्टियों ने पेड़ काटे जाने का प्रस्ताव आते ही विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था.
इस मद्देनज़र बॉम्बे हाईकोर्ट में कई याचिकाएं भी दायर की गईं लेकिन अदालत ने इस इलाके को जंगल मानने से इनकार करते हुए सभी याचिकाएं ख़ारिज़ कर दीं.
यहां रहने वाले आदिवासी युवा श्याम प्रकाश भोइर कहते हैं, "जैसे एक बेटा अपनी मां के बग़ैर नहीं रह सकता, वैसे ही हम इस जंगल के बिना नहीं रह सकते. "एक पेड़ सिर्फ़ पेड़ नहीं होता. उसमें छिपकली, बिच्छू, कीड़े, झींगुर और चिड़िया भी रहती हैं. हर पेड़ की अपनी इकॉलजी है. यह सिर्फ़ पेड़ की नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व की बात है."
आरे के ही एक गांव में रहने वाली मनीषा ने बताया, "हमसे पिछली पीढ़ी पढ़ी-लिखी नहीं थी. वह कृषि पर निर्भर थी और आदिवासी लोग जंगलों से ही सब्ज़ियां इकट्ठा करते थे. हम भी उसी पर निर्भर थे. हम बाज़ार से कुछ भी नहीं ख़रीदते थे."
मुंबई मेट्रो रेल प्राधिकरण ने कहा है कि किसी भी आदिवासी या वन्यजीव की जगह को कार डिपो के लिए नहीं लिया जाएगा लेकिन आदिवासियों का मानना है कि मेट्रो परियोजना के यहां आने के बाद वन्यजीवन पर इसका असर पड़ेगा.
रेल प्राधिकरण के अनुसार, "यह एक महत्वपूर्ण परियोजना है. इलाके में यात्रा करने के दौरान हर दिन 10 लोग मर जाते हैं. मेट्रो शुरू होने के बाद मुंबई के स्थानीय लोगों का तनाव कम हो जाएगा."
मनीषा कहती हैं, "हम मेट्रो या मेट्रो कार शेड का विरोध नहीं कर रहे हैं. हम मेट्रो कार डिपो को बनाने के लिए 2,185 से अधिक पेड़ काटे जाने का विरोध कर रहे हैं. हम नहीं चाहते कि विकास न हो लेकिन ये पेड़ की क़ीमत पर नहीं होना चाहिए."
मनीषा के मुताबिक़, "यहां पेड़-पौधे और क़ुदरत का ऐसा रूप इसलिए है क्योंकि आदिवासी इसका संरक्षण करते हैं. सरकार कहती है कि ज़मीन सरकार की है, लेकिन सरकार यहां के पेड़ों की देखभाल नहीं करती."
आरे कॉलोनी में 4.8 लाख पेड़ हैं लेकिन फिर भी यह वन विभाग के अंतर्गत नहीं हैं.
इस पर श्याम कहते हैं. "उन्होंने कहा है कि वे 2,185 पेड़ काटेंगे. इस छोटी सी जगह में बहुत सारे पेड़ हैं, इसका मतलब है कि यह जंगल है. कोई भी इस पर सहमत होगा लेकिन सरकार इसको नहीं मानती है."
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि अदालत की अनुमति के बाद पेड़ को काटने के लिए 15 दिनों का समय दिया जाना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हुआ और तुरंत ही पेड़ काटे जाने लगे.
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