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धरती का फ़्रीजर आर्कटिक क्यों सुलग रहा है

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने आरे कॉलोनी में पेड़ों की कटाई को लेकर कहा, "बॉम्बे हाई कोर्ट ने फ़ैसला दिया है कि यह जंगल नहीं है."
उन्होंने कहा, "जब दिल्ली में पहले मेट्रो स्टेशन बना तो 20-25 पेड़ काटे जाने की ज़रूरत थी. तब भी लोगों ने विरोध किया था, लेकिन काटे गए प्रत्येक पेड़ के बदले पांच पेड़ लगाए गए. दिल्ली में कुल 271 मेट्रो स्टेशन बने, साथ ही जंगल भी बढ़ा और 30 लाख लोगों की पर्यावरण पूरक सार्वजनिक यातायात की व्यवस्था हुई. यही मंत्र है, विकास भी और पर्यावरण की रक्षा भी, दोनों साथ-साथ."
इधर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को ख़ुद अपनी सहयोगी शिवसेना से सबसे बड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे आरे कॉलोनी में पेड़ों की कटाई के विरोध में उतर आए हैं.
'हम प्रकृति की पूजा करते हैं और प्रकृति ही हमारा ईश्वर है.'....'आदिवासी पूरी तरह से जंगल पर निर्भर हैं.'
ये कहना है कि मुंबई की आरे कॉलोनी में र
इस इलाके में रहने वाले आदिवासी कार्यकर्ता प्रकाश भोइर ने बीबीसी को बताया, "रात लगभग 9.30 बजे कॉर्पोरेशन के लोग अंदर आए और उन्होंने कार-शेड के लिए चिह्नित जगह पर पेड़ों को काटना शुरू कर दिया.''
यहां प्रदर्शन में हिस्सा लेने में सुशांत बाली ने बीबीसी को बताया, "यह आंदोलन पांच साल से चल रहा है, मैं पिछले साल इसमें शामिल हुआ. ये पेड़ हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं. वे कहते हैं कि यह जंगल नहीं है. कल वो आपको बताएंगे कि आप इंसान नहीं हैं और आपको ऑक्सीजन की ज़रूरत नहीं है. हम इस शहर और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं. हम पिछले सात हफ़्तों से लगातार इसका विरोध कर रहे हैं.''
बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा याचिकाएं ख़ारिज़ करने के बाद पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने शनिवार को एक नई अर्ज़ी भी डाली थी लेकिन अदालत ने इसमें दख़ल देने से इनकार कर दिया है.
बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से सुप्रीम कोर्ट का रुख़ करने को कहा है.
शुक्रवार को बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह कहकर याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया था कि मामला पहले की सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के समक्ष लंबित है, इसलिए हाई कोर्ट इसमें फैसला नहीं दे सकता है.
हने वाले श्याम प्रकाश भोइर और मनीषा धिंडे का.
इस आरे कॉलोनी के भीतर 27 छोटे-छोटे गांव हैं और इन गांवों में सदियों से तकरीबन 8,000 आदिवासी रहते आए हैं.
कई युवा आदिवासी व्यस्त मुंबई शहर में न रहकर इन शांतिपूर्ण गांवों में ही रहना पसंद करते हैं.
अब मुंबई मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए इसी आरे कॉलोनी के जंगल काटे जा रहे हैं. इसी इलाके में मेट्रो के लिए कार शेड बनाया जाएगा और इसके लिए तकरीबन 2,185 पेड़ काटे जाएंगे.
पेड़ों की कटाई शुरू भी हो चुकी है लेकिन यहां के पेड़ काटे जाने का भारी विरोध भी हो रहा है.
स्थानीय लोगों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं, कुछ बॉलीवुड कलाकारों और राजनीतिक पार्टियों ने पेड़ काटे जाने का प्रस्ताव आते ही विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था.
मुंबई मेट्रो रेल प्राधिकरण ने कहा है कि किसी भी आदिवासी या वन्यजीव की जगह को कार डिपो के लिए नहीं लिया जाएगा लेकिन आदिवासियों का मानना है कि मेट्रो परियोजना के यहां आने के बाद वन्यजीवन पर इसका असर पड़ेगा.
रेल प्राधिकरण के अनुसार, "यह एक महत्वपूर्ण परियोजना है. इलाके में यात्रा करने के दौरान हर दिन 10 लोग मर जाते हैं. मेट्रो शुरू होने के बाद मुंबई के स्थानीय लोगों का तनाव कम हो जाएगा."
इस मद्देनज़र बॉम्बे हाईकोर्ट में कई याचिकाएं भी दायर की गईं लेकिन अदालत ने इस इलाके को जंगल मानने से इनकार करते हुए सभी याचिकाएं ख़ारिज़ कर दीं.
यहां रहने वाले आदिवासी युवा श्याम प्रकाश भोइर कहते हैं, "जैसे एक बेटा अपनी मां के बग़ैर नहीं रह सकता, वैसे ही हम इस जंगल के बिना नहीं रह सकते. "एक पेड़ सिर्फ़ पेड़ नहीं होता. उसमें छिपकली, बिच्छू, कीड़े, झींगुर और चिड़िया भी रहती हैं. हर पेड़ की अपनी इकॉलजी है. यह सिर्फ़ पेड़ की नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व की बात है."
आरे के ही एक गांव में रहने वाली मनीषा ने बताया, "हमसे पिछली पीढ़ी पढ़ी-लिखी नहीं थी. वह कृषि पर निर्भर थी और आदिवासी लोग जंगलों से ही सब्ज़ियां इकट्ठा करते थे. हम भी उसी पर निर्भर थे. हम बाज़ार से कुछ भी नहीं ख़रीदते थे."
मनीषा कहती हैं, "हम मेट्रो या मेट्रो कार शेड का विरोध नहीं कर रहे हैं. हम मेट्रो कार डिपो को बनाने के लिए 2,185 से अधिक पेड़ काटे जाने का विरोध कर रहे हैं. हम नहीं चाहते कि विकास न हो लेकिन ये पेड़ की क़ीमत पर नहीं होना चाहिए."
मनीषा के मुताबिक़, "यहां पेड़-पौधे और क़ुदरत का ऐसा रूप इसलिए है क्योंकि आदिवासी इसका संरक्षण करते हैं. सरकार कहती है कि ज़मीन सरकार की है, लेकिन सरकार यहां के पेड़ों की देखभाल नहीं करती."
आरे कॉलोनी में 4.8 लाख पेड़ हैं लेकिन फिर भी यह वन विभाग के अंतर्गत नहीं हैं.
इस पर श्याम कहते हैं. "उन्होंने कहा है कि वे 2,185 पेड़ काटेंगे. इस छोटी सी जगह में बहुत सारे पेड़ हैं, इसका मतलब है कि यह जंगल है. कोई भी इस पर सहमत होगा लेकिन सरकार इसको नहीं मानती है."
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि अदालत की अनुमति के बाद पेड़ को काटने के लिए 15 दिनों का समय दिया जाना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हुआ और तुरंत ही पेड़ काटे जाने लगे.
शुक्रवार को अदालत का फ़ैसला आते ही प्रदर्शन और तेज़ हो गए. विरोध कर रहे पर्यावरण कार्यकर्ताओं की पुलिस के साथ हाथापाई हुई और इलाक़े में तनाव को देखते हुए तैनात पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ा दी गई और साथ ही पूरे इलाके में धारा 144 लगा दी गई.
पुलिस ने विरोध कर रहे 50 से अधिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया और अन्य कई लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है.
इस बीच आरे कॉलोनी के अंदर बसे गांवों में रहने वाले आदिवासियों को अपने भविष्य की चिंता सता रही है.

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