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तो क्या आप दूसरे देशों की वेबसाइटें नहीं देख सकेंगे?

ये दुनिया तमाम देशों में बंटी है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सभी देश इस बात पर एकमत हैं कि उन्हें एक-दूसरे की सीमाओं का सम्मान करना चाहिए.
इसके उलट इंटरनेट की दुनिया सरहदों से परे है. किसी अमरीकी वेबसाइट को भारत में आराम से देखा और इस्तेमाल किया जा सकता है. यही वजह है कि आज फ़ेसबुक और गूगल जैसी कंपनियों का दुनिया भर में राज है.
पर, बहुत से देश ऐसे हैं जो इंटरनेट को भी सरहदों के दायरे में बांधना चाहते हैं. 2010 में सीरिया और रूस जैसे कई देशों ने संयुक्त राष्ट्र संघ से अपील की थी कि जिस तरह देशों की सीमाओं और उनकी संप्रभुता को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली है, ठीक उसी तरह डिजिटल दुनिया में भी सरहदों की लक़ीरें खींची जानी चाहिए. हदबंदी होनी चाहिए.
इंटरेनट सलाहकार हैस्केल शार्प उस वक़्त बहुराष्ट्रीय तकनीकी कंपनी सिस्को में काम करते थे. शार्प कहते हैं कि, 'संयुक्त राष्ट्र के पास जाने वाले ये देश चाहते थे कि सबके लिए खुली और सरहदों से परे इंटरनेट की दुनिया में भी हदबंदी हो. हर देश की पहुंच में इंटरनेट का ख़ास हिस्सा ही हो.'
उस वक़्त संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस अपील को ख़ारिज कर दिया था. क्योंकि तमाम देश नहीं चाहते थे कि इंटरनेट की आज़ादी पर किसी तरह का पहरा हो. किसी सरकार का इस पर शिकंजा हो.
इस बात को क़रीब एक दशक बीत चले हैं. जो देश इंटरनेट में सीमाओं की लकीरें खींचना चाहते थे, वो इस झटके के बाद उबरे हैं और अपने-अपने तरीक़े से इंटरनेट को क़ाबू में करने में जुटे हैं.
मसलन, रूस ने अपने यहां के इंटरनेट ग्राहकों की हिफ़ाज़त के नाम पर कई क़ानून बनाए हैं. वो इंटरनेट के ज़रिए देश में आने और रूस से बाहर जाने वाली जानकारियों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है.
इंटरनेट के अमरीकी एक्सपर्ट रॉबर्ट मोर्गस कहते हैं कि, 'रूस इंटरनेट पर अपनी सरकार का शिकंजा कसना चाहता है. वो चाहता है कि उसके नागरिक जो इंटरनेट देखें-सुनें या इस्तेमाल करें, वो उसकी जानकारी में हो.'
रूस ही क्यों, बहुत से देश हैं, जो इंटरनेट पर किसी न किसी तरह का नियंत्रण चाहते हैं. कभी राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर, तो कभी अपने अवाम को बाहरी दुनिया के ख़तरों से दूर रखने के नाम पर. रोज़-ब-रोज़ इंटरनेट पर नई पाबंदियां आयद की जा रही हैं. आज कई देश मिलकर भी इंटरनेट के बेलगाम घोड़े को क़ाबू में करने मे जुटे हैं.
असल में रूस, ईरान और सीरिया जैसे बहुत से देशों को इंटरनेट के पश्चिमी देशों के नियंत्रण में होने से ऐतराज़ है. इन देशों को पश्चिमी देशों के जीवनमू्ल्यों से परेशानी है. उन्हें लगता है कि इंटरनेट के ज़रिए उनके देशवासियों को पश्चिमी देश बरगला सकते हैं. प्रभावित कर सकते हैं. क्योंकि इंटरनेट की दुनिया इतनी खुली है कि कोई किसी को कुछ भी भेज सकता है. या किसी से कुछ भी ले सकता है.
इंटरनेट दो क़ायदों से संचालित होता है. एक टीसीपी यानी ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकॉल और दूसरा आईपी यानी इंटरनेट प्रोटोकॉल. इसके तहत कोई भी जानकारी इंटरनेट पर बेरोक-टोक भेजी या हासिल की जा सकती है. ये सरहदों के दायरों से परे है. इंटरनेट पर बस आईपी या टीसीपी एड्रेस होना चाहिए.
रूस जैसे देश चाहते हैं कि सूचनाओं के इस बेरोक-टोक आदान-प्रदान पर रोक लगे. सरकारों के पास ये अख़्तियार हो कि वो एक जगह से दूसरी जगह भेजे जाने वाले डेटा को नियंत्रित कर सकें.
कुछ लोग इसे रूस, सीरिया या ईरान की तानाशाही कहकर ख़ारिज कर सकते हैं. पर, कई बार सरकारों की चिंताएं वाजिब भी होती हैं. इंटरनेट के ज़रिए उनकी सामरिक ताक़त को निशाना बनाया जा सकता है. या फिर बिजली और संचार सेवाओं को ठप किया जा सकता है. फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाकर उत्पात मचाया जा सकता है.
रॉबर्ट मोर्गस कहते हैं कि, 'रूस और चीन इस बात को औरों से पहले समझ गए कि इंटरनेट पर बेरोक-टोक संचार नुक़सानदेह हो सकता है. ख़ास तौर पर सियासी इस्तेमाल के लिए उनके नागरिकों को निशाना बनाया जा सकता है. या बैंकिंग सिस्टम को निशाने पर लिया जा सकता है.'
पर, रूसी मूल के ब्रिटिश विद्वान लिंकन पिगमैन कहते हैं कि रूस और चीन की सरकारें अपने नागरिकों की हिफ़ाज़त करने के बजाय उन्हें नियंत्रित करने को लेकर ज़्यादा फ़िक्रमंद हैं.
रूस और चीन ने 2011-2012 में ही इंटरनेट की हदबंदी की बातें शुरू कर दी थीं. उस वक़्त रूस में दो साल चलने वाले विरोध-प्रदर्शन हो रहे थे. कई देशों में इंटरनेट की वजह से बग़ावत की चिंगारियां शोलों में तब्दील हो गई थीं. रूस चाहता था कि उसके नागरिकों को बग़ावत के लिए भड़काने वाले संदेश इंटरनेट के ज़रिए न पहुंचें.
दिक़्क़त ये थी कि रूस सूचनाओं के बेरोक-टोक आदान-प्रदान को रोक नहीं सकता था. इंटरनेट की सुविधा कुछ केबल और कुछ सैटेलाइट की मदद से तमाम देशों तक पहुंचती है. मसलन, उत्तर कोरिया तक इंटरनेट पहुंचाने के लिए एक केबल बिछी है. यहां स्विच बंद किया और पूरे उत्तर कोरिया में इंटरनेट सेवा बंद. पर, रूस जैसे देश के लिए ये मुमकिन नहीं.
आज रूस की अर्थव्यवस्था इंटरनेट की वजह से बाक़ी दुनिया से जुड़ी है. पहले तो ये मुमकिन ही नहीं, पर फिर भी अगर रूस ने उत्तर कोरिया की तरह इंटरनेट के सभी तार काट दिए, तो उसकी अर्थव्यवस्था भरभरा कर गिर जाएगी.
इसीलिए रूस जैसे देश चाहते हैं कि आईपी एड्रेस या ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकॉल पर उनका नियंत्रण हो.
चीन इस मामले में सबसे आगे है. इंटरनेट पर शिकंजे के लिए चीन ने गोल्डन शील्ड नाम की व्यवस्था बना रखी है. इसे ग्रेट फायरवॉल ऑफ़ चाइना कहते हैं. इसके ज़रिए चीन कई वेबसाइट या आईपी एड्रेस को अपने यहां रोक सकता है.
पर, चीन की व्यवस्था रूस में लागू नहीं हो सकती. इसमें तकनीकी अड़चनें हैं. चीन ने अपने यहां इंटरनेट का पूरा जाल अपनी कंपनियों के ज़रिए फैलाया है. उसका इस पर पूरा नियंत्रण है. चीन में इंटरनेट का प्रवाह आने-जाने के लिए कुछ ख़ास ठिकाने ही हैं, जिन पर चीन की निगाह भी है औऱ नियंत्रण भी.
इसके उलट रूस में इंटरनेट की सेवाएं उस दौर में फैली थीं, जब रूस ने खुले दिल से इंटरनेट का स्वागत किया था. आज पूरे रूस में इंटरनेट का बुनियादी ढांचा विकसित हो चुका है. पर, इस पर रूस का कोई ज़ोर नहीं.

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